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नई दिल्ली/लखनऊ। संविधान प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Swami Prasad Maurya ने केंद्र सरकार के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को विस्तृत ज्ञापन भेजकर भारत सरकार के कार्यालय ज्ञापन संख्या 36020/6/2025-PP (Res.-2) दिनांक 26 मई 2026 को तत्काल निरस्त करने की मांग की है।
ज्ञापन में कहा गया है कि संविधान द्वारा अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) एवं अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को प्रदान किया गया आरक्षण केवल सरकारी नौकरी का प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व देने का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में यदि आरक्षित रिक्त पदों को NFS (Non-Availability of Suitable Candidate) के आधार पर सामान्य वर्ग से भरने की व्यवस्था की जाती है, तो इससे संविधान की मूल भावना प्रभावित हो सकती है।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने ज्ञापन में कहा कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में आरक्षित वर्ग का उपयुक्त अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं होता है, तो सरकार का दायित्व है कि रिक्तियों को नियमानुसार कैरी फ़ॉरवर्ड (Carry Forward) करे, भर्ती प्रक्रिया को और प्रभावी बनाए तथा पात्र अभ्यर्थियों को अवसर उपलब्ध कराए। आरक्षित पदों को सामान्य वर्ग में परिवर्तित करना सामाजिक न्याय की अवधारणा के विपरीत बताया गया है।
ज्ञापन में केंद्र सरकार से चार प्रमुख मांगें की गई हैं। पहली, 26 मई 2026 के कार्यालय ज्ञापन को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। दूसरी, आरक्षित रिक्तियों को अनारक्षित करने की प्रक्रिया को अधिक कठोर और पारदर्शी बनाया जाए। तीसरी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। चौथी, इस नीति के औचित्य पर संसद और देश की जनता के समक्ष स्पष्ट स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जाए।
अपनी जनता पार्टी का कहना है कि सामाजिक न्याय भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है और आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने वाला कोई भी कदम समाज के वंचित वर्गों के विश्वास को प्रभावित कर सकता है। पार्टी ने उम्मीद जताई है कि केंद्र सरकार इस विषय पर गंभीरता से पुनर्विचार करेगी और संविधान की भावना के अनुरूप उचित निर्णय लेगी।
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा तेज होने की संभावना है। आने वाले दिनों में इस विषय पर विभिन्न संगठनों की प्रतिक्रिया और केंद्र सरकार का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है।






